क्षिप्रा

त्याग, तपस्या, बलिदान का प्रतीक है अयोध्या का श्री राम मंदिर…

  • 5 दिन तक लगातार जेल में बंद रहे थे प्रकट वाहिनी के कारसेवक…
  • राम मंदिर बनने की खुशी में अब मन ही मन हो रहे गदगद..

मयूर वाघेला ● क्षिप्रा


राम मंदिर बनने की सबसे ज्यादा खुशी कार सेवकों को है। उन्हीं के संघर्ष का यह परिणाम है जो रामलला दिव्य और भव्य मंदिर में विराजित होने वाले हैं। हर कार सेवक का अपना अलग किस्सा है। वर्ष 1992 में अयोध्या के लिए क्षेत्र से बड़ी संख्या में कारसेवक अयोध्या के लिए रवाना हुए थे। कुछ अयोध्या पहुंचने में सफल रहे, तो कुछ को बीच रास्तो में अस्थायी जेलों में बंद कर दिया गया था। 6 दिनों बाद जेल से छूटकर यह अयोध्या पहुँचे तो दुःखो का समावेश सुखों में बदल चुका था। 31 साल पहले अयोध्या में जो घटा उसकी कुछ झलकियां बताते हुए शिप्रा में रहने वाले 53 वर्षीय कृष्णकांत नागर ने बताया कि श्रीराम मंदिर को लेकर 6 दिसंबर 1992 में अयोध्या में एक बड़ी जनसभा होने वाली थी। वह मक्सी में निवास करते थे ओर मात्र 10 वर्ष की आयु में ही संघ से जुड़कर बाल स्वयंसेवक बन गए थे। तकरीबन बारह वर्ष बाद संघ के नगर कार्यवाह के साथ नागर को 22 वर्ष की आयु में नगर बौधिक प्रमुख बनाया गया। दिनांक 4 दिसंबर 1992 को मक्सी नगर सुप्रभात शाखा मे 8 स्वयंसेवकों की टीम गठित की गई जिसे कार सेवा मे “प्रकट वाहिनी “का नाम देकर विजय तिलक के साथ अयोध्या के लिए विदाई दी गयी। मक्सी रेल्वे स्टेशन से तत्कालीक विधायक लक्ष्मी नारायण पटेल की अगुवाई मे यह कारसेवक लखनऊ जा पहुंचे। जबकि सैकड़ो की संख्या में कारसेवको को झांसी रेलवे स्टेशन पर गिरफ्तार कर लिया गया। लखनऊ से अयोध्या, बाराबंकी के सभी वाहनो के मार्ग बंद कर दिये गये ताकि कारसेवक अयोध्या में प्रवेश नही कर सके।इसके बाद इन सेवको के काफिले ने भूख प्यास की चिंता करते बगैर अन्य रास्ते से अयोध्या की ओर बढ़ चलने की ठान ली। लगभग 50 किलोमीटर आगे बाराबंकी के समीप पहुँचे काफिले का सामना तत्कालीन सांसद मुन्न खाँ से हो गया। सवाल जवाब के बाद काफिला फिर आगे की ओर बढ़ चला। बाराबंकी में पुलिस ने घेराबंदी कर दी थी ताकि कोई यहां से आगे न जा पाए। नागर ने बताया कि 6 दिसंबर को प्रकट वाहिनी के साथियों के साथ हमे अस्थाई जेल में नजर बंद कर दिया गया। 5 दिन तक लगातार जेल में बंद होने के बाद सभी साथियों को बगैर कोई शर्त के छोड़ दिया गया। इसके बाद बस के माध्यम से बाराबंकी से अयोध्या पहुँचे। अयोध्या पहुंचकर हुआ सुख और दुख का समावेश : एक तरफ कारसेवको द्वारा बाबरी ढांचा जमींदोज करने की खुशी, तो कुछ पल बाद दुःख की अनुभूति का अनुभव कारसेवको को हुआ। प्रकट वाहिनी के नागर ने चर्चा में बताया कि  सरयू नदी पुल पर सेकडो की सँख्या में रामभक्त कारसेवको की चरण पादुकाएं जो भगदड़ के दौरान वही रह गयी थी। आगे चलकर देखा तो 21 वर्षीय संत सरयू नदी में मृत अवस्था मे दिखाई दिए। तुरंत ब्रह्म विलीन देह को उनके प्रमुख स्थान पर पहुँचा दी गयी। उस समय भाव विभोर मन मे आभात हुआ। 12 दिसंबर 1992 कुछ ही दूरी तय करने के बाद “रामभक्त की हनुमान गाड़ी” चारो ओर सैकड़ो कारसेवको का “जय श्री राम” का गगन भेदी जयघोष हो रहा था। बड़ी संख्या में वानरों का दल जो अयोध्या में हुए “दमनचक” का साक्षी बन मानो कार सेवकों के अयोध्या पहुँचने की बाट जोख रहे हो। कई संतमहात्मा – पुण्य आत्मा, कारसेवक, धर्म रक्षक – संवरक्षक पदाधिकारी धर्म ध्वजा फहराकर हमारे बीच से ब्रहमलीन हो गये। शेष रह गयी तो “मनमंदिर” मे उनकी बलिदानी गाथा। कृष्णकांत नागर ने बताया कि आज खुद पर गर्व महसूस करते हैं कि राम का कार्य किया है। राम मंदिर बन रहा है। इसकी खुशी इतनी है की शब्दों में बयां नहीं कर सकते।

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