क्षिप्रा

रिमझिम बारिशो के बीच डोल में सवार होकर निकले जगत के पालनहार

क्षिप्राखबर @ क्षिप्रा। हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का विशेष महत्व है। हर वर्ष कुल 24 एकादशी तिथियां आती हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है। इसे डोल ग्यारस और जलझूलनी एकादशी भी कहते है। श्री विघ्नविनाशक चिंताहरण गणेश मंदिर क्षिप्रा के पुजारी ने बताया कि इस तिथि पर भगवान कृष्ण के बाल स्वरूप बाल-गोपाल को एक डोल में विराजित कर शोभा यात्रा निकाली जाती है। इसलिए इसे डोल ग्यारस कहा जाता है। कृष्ण जन्म के अठारहवें दिन माता यशोदा ने उनका जलवा पूजन किया था। इसी दिन को डोल ग्यारस के रूप में मनाया जाता है।
सोमवार को डोल ग्यारस पर रिमझिम बारिश का दौर चलता रहा। रंगबिरंगे गुब्बारों एवं पुष्पो द्वारा डोल को सजाया गया। डोल में आगे-आगे जहा अखाड़े द्वारा कई करतब दिखाए गए तो पीछे घण्टे घड़ियाल के साथ श्रद्धालुओं ने डोल में विराजित भगवान श्री बालगोपाल की पूजा अर्चना की। मुख्य डोल बरलाई रोड़ के गणेश मंदिर, पीरकराड़िया के श्री राम मंदिर, बुढ़ी बरलाई के श्री राम मंदिर, पुराने एबी रोड़ के भद्रकाली माता मंदिर से बैंड-बाजों की स्वर लहरियों पर निकाले गए।
श्रद्धालुजन हाथी घोड़ा पालकी, जय कन्हैयालाल की के जयघोष लगा रहे थे। पूरे क्षेत्र में भगवान को डोल रथ में विराजित कर नगर भृमण कराया गया। पश्चात सुंदर सुंदर डोल एवं झांकियो को क्षिप्रा नदी तट पर स्थित विश्वपति महादेव मंदिर पर ले जाया गया। यहां आरती पूजन कर प्रसादी वितरण किया गया।

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